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बिहार से गुजरात में मजदूरी के लिए गए मजदूर की सड़क हादसे में मौत, रामगढ़ में पसरा मातम

शव पोस्टमार्टम के बाद शव को बिहार के कैमूर लाया जा रहा है


कैमूर भभुआ।गुजरात से एक दर्दनाक खबर सामने आई है, जिसने बिहार के कैमूर के भभुआ अनुमंडल क्षेत्र के रामगढ़ मुंडेश्वरी गांव को शोक में डुबो दिया है। रोजी-रोटी की तलाश में गुजरात गए एक मजदूर की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। मृतक की पहचान रामगढ़ मुंडेश्वरी निवासी हीरा यादव के पुत्र पप्पू यादव के रूप में हुई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पप्पू यादव पिछले कुछ समय से गुजरात में रहकर मजदूरी का काम कर रहे थे। वह अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए दिन-रात मेहनत करते थे। 11 फरवरी 2026 की रात वह रोज की तरह काम खत्म कर अपने कमरे पर लौटे थे। बताया जा रहा है कि रात करीब 11 बजे उन्हें किसी काम से बाहर जाना था। उनकी पत्नी ने बार-बार रात में बाहर जाने से मना किया, लेकिन काम की जिम्मेदारी समझते हुए वह बाइक लेकर निकल पड़े।


इसी दौरान रास्ते में किसी अज्ञात वाहन ने उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि मौके पर ही उनकी मौत हो गई। घटना के बाद स्थानीय लोगों ने पुलिस को सूचना दी। गुजरात प्रशासन तुरंत मौके पर पहुंचा और शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू की। पुलिस ने दुर्घटनास्थल से बाइक बरामद की और आसपास के लोगों से पूछताछ की। जांच के दौरान बाइक और सामान से सेठ का मोबाइल नंबर मिला, जिसके यहां पप्पू यादव काम करते थे।

गुजरात प्रशासन ने सेठ से संपर्क कर मृतक की पहचान सुनिश्चित की और परिजनों को इस दुखद घटना की सूचना दी। इसके बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा। कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद शव को परिजनों को सौंप दिया गया। अब शव को बिहार के कैमूर जिले के रामगढ़ मुंडेश्वरी गांव लाया जा रहा है।


इस हृदयविदारक घटना की खबर जैसे ही गांव पहुंची, पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। रामगढ़ गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है। हर किसी की आंखें नम हैं। परिजन रो-रोकर बेहाल हैं। पिता हीरा यादव का कहना है कि उन्होंने बेटे को बेहतर भविष्य की उम्मीद में बाहर भेजा था, लेकिन किसे पता था कि वह इस तरह हमेशा के लिए दूर चला जाएगा। पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
पप्पू यादव अपने पीछे बूढ़े माता-पिता, पत्नी और छोटे-छोटे बच्चों को छोड़ गए हैं। गांव के लोग भी इस घटना से स्तब्ध हैं। सभी की जुबान पर एक ही सवाल है कि आखिर कब तक मजदूरों को इस तरह असमय मौत का शिकार होना पड़ेगा?

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