अतिक्रमण की भेंट चढ़ा अतायस्तगंज का तालाब, 100 से अधिक परिवारों पर जलभराव और बीमारी का मंडराया खतरा…..?

30 वर्षों से नहीं हुई सफाई, 13.4 बिस्वा की गड़ही सिमटकर रह गई लगभग 3 बिस्वा; ग्रामीणों ने प्रशासन से लगाई न्याय की गुहार….?
पत्रकार-प्रशान्त कुमार की एक रिपोर्ट
चंदौली/चकिया। विकासखंड शहाबगंज की ग्राम पंचायत अतायस्तगंज में स्थित सार्वजनिक तालाब और गड़ही का अस्तित्व आज गंभीर संकट में है। लगातार हो रहे अतिक्रमण और तीन दशकों से सफाई न होने के कारण गांव के लगभग 100 परिवार बरसात के मौसम में जलभराव, गंदगी और संक्रामक बीमारियों की चपेट में आने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, मौजा अतायस्तगंज में स्थित आराजी संख्या-200, खाता संख्या-00302 की गड़ही का राजस्व अभिलेखों में क्षेत्रफल 0.1670 हेक्टेयर (लगभग 13.4 बिस्वा) दर्ज है, लेकिन मौके पर इसका अस्तित्व घटकर लगभग 3 बिस्वा ही रह गया है। लगातार पटाव और अतिक्रमण के कारण गांव की प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है।
ग्रामीणों का कहना है कि हल्की से हल्की बारिश में भी नालियों का गंदा पानी घरों में वापस भर जाता है। इससे पूरे गांव में बदबू, जहरीली गैस और मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है, जिससे डेंगू, मलेरिया, त्वचा रोग तथा अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा बना रहता है। हर वर्ष ग्रामीणों को इलाज पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस तालाब और गड़ही की करीब 30 वर्षों से सफाई नहीं कराई गई, जबकि यह गांव के जल निकासी का एकमात्र प्रमुख स्रोत है। यदि समय रहते अतिक्रमण नहीं हटाया गया और तालाब का पुनर्जीवन नहीं किया गया, तो भविष्य में स्थिति और भी भयावह हो सकती है।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, तहसील प्रशासन तथा संबंधित विभागों से मांग की है कि तालाब एवं गड़ही को उसके मूल स्वरूप में बहाल किया जाए, अतिक्रमण हटाकर गहरी खुदाई, सफाई और सुंदरीकरण कराया जाए ताकि गांव को जलभराव और बीमारी जैसी गंभीर समस्याओं से स्थायी राहत मिल सके।
ग्रामीणों का कहना है कि तालाब और गड़ही केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि पूरे गांव के अस्तित्व, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का आधार हैं। अब सभी की निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं।



