स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत से फिर खुला अवैध हॉस्पिटल, मरीजों की जिंदगी बन रही कमाई का जरिया

स्वास्थ्य विभाग की मेहरबानी से फिर खुला सील अस्पताल!
कार्रवाई के कुछ दिन बाद ही दोबारा चालू हुआ जच्चा-बच्चा केंद्र, विभागीय सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
चकिया / चन्दौली
चकिया तहसील क्षेत्र में अवैध निजी अस्पतालों और जच्चा-बच्चा केंद्रों का संचालन स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। विभाग द्वारा समय-समय पर कार्रवाई कर अस्पतालों को सील करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वही अस्पताल दोबारा मरीजों का इलाज करते नजर आने लगते हैं। इससे यह साफ प्रतीत होता है कि कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है और जिम्मेदार अधिकारी अवैध संचालन पर स्थायी रोक लगाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।
चकिया नगर के पोस्ट ऑफिस रोड स्थित “मां मुंडेश्वरी हॉस्पिटल जच्चा बच्चा केंद्र” इसका ताजा उदाहरण बनकर सामने आया है। कुछ दिन पूर्व स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अस्पताल में अनियमितताएं मिलने के बाद कार्रवाई करते हुए उसे सील किया था। विभाग ने उस समय बड़े स्तर पर कार्रवाई का दावा भी किया, लेकिन कुछ ही दिनों बाद अस्पताल फिर से संचालित होने लगा। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सील किए गए अस्पताल को दोबारा किसके आदेश पर खोला गया और विभागीय कार्रवाई इतनी कमजोर क्यों साबित हुई?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कोई नई बात नहीं है। हर वर्ष इस अस्पताल पर कार्रवाई होती है, लेकिन कुछ समय बाद विभागीय “कृपा” से अस्पताल फिर से चालू हो जाता है। लोगों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग सख्ती से कार्रवाई करे तो अवैध अस्पताल दोबारा खुल ही नहीं सकते, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत के कारण यह खेल लगातार जारी है।
सूत्रों की मानें तो चकिया और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में दर्जनों निजी अस्पताल, क्लीनिक और जच्चा-बच्चा केंद्र बिना मानकों के संचालित हो रहे हैं। कई अस्पतालों के पास वैध पंजीकरण तक नहीं है, जबकि कई जगह प्रशिक्षित डॉक्टरों के बजाय अप्रशिक्षित कर्मचारी मरीजों का इलाज कर रहे हैं। गंभीर बीमारियों का इलाज बिना विशेषज्ञ डॉक्टरों के किया जा रहा है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ रही है।

बताया जा रहा है कि कई अस्पतालों में न तो पर्याप्त चिकित्सा उपकरण हैं और न ही इमरजेंसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके बावजूद खुलेआम ऑपरेशन, प्रसव और गंभीर मरीजों का इलाज किया जा रहा है। आरोप यह भी है कि मरीजों से मोटी रकम वसूलने के बावजूद उन्हें उचित इलाज नहीं मिल पाता। कई मामलों में मरीजों की हालत बिगड़ने पर उन्हें वाराणसी या जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।
क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग की छापेमारी सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह गई है। कार्रवाई के दौरान अस्पतालों को सील कर दिया जाता है, लेकिन कुछ समय बाद फिर वही अस्पताल पहले की तरह चलने लगते हैं। इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि कहीं न कहीं विभागीय स्तर पर संरक्षण दिया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी अस्पताल में गंभीर अनियमितताएं पाई गई थीं, तो फिर उसे दोबारा संचालन की अनुमति कैसे मिल गई? क्या मानकों की जांच दोबारा हुई? क्या अस्पताल ने सभी खामियों को दूर कर लिया या फिर मामला सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया?
स्थानीय नागरिकों ने जिला प्रशासन और शासन से मांग की है कि चकिया क्षेत्र में संचालित सभी निजी अस्पतालों और क्लीनिकों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही जिन अस्पतालों में मानकों की अनदेखी हो रही है, उनके खिलाफ स्थायी कार्रवाई करते हुए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और कथित मिलीभगत का सीधा असर गरीब और ग्रामीण मरीजों पर पड़ रहा है। इलाज के नाम पर उनकी जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है और जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो किसी बड़े हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता।



