उत्तर प्रदेशचंदौलीशहाबगंज

फर्जी मजदूरों के सहारे मनरेगा में खेल! शहाबगंज ब्लॉक में कागजों पर दौड़ रही योजना, धरातल पर पसरा सन्नाटा……?

केरागांव मे कागज मे 109 मजदूरों की ऑनलाइन हाजिरी, मौके पर गिने-चुने श्रमिक

असली मजदूर बोले — “काम मांगो तो भगाया जाता है, चहेते लोगों के नाम पर निकल रहा पैसा”

चकिया/चन्दौली/। केन्द्र सरकार की  गांव के जरुरतमंद गरीबों को रोजगार देने वाली महात्वाकांक्षी मनरेगा योजना चन्दौली के शहाबगंज ब्लॉक में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। शहाबगंज ब्लॉक क्षेत्र के केरायगांव में मनरेगा कार्यों में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े के आरोप सामने आने के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।


ग्रामीणों और सूत्रों के मुताबिक केरायगांव मे विभिन्न कार्यस्थलों पर ऑनलाइन रिकॉर्ड में 109 मजदूरों की उपस्थिति दर्ज दिखाई जा रही है, लेकिन जब मौके पर जाकर देखा गया तो अधिकांश स्थानों पर सन्नाटा पसरा मिला। कहीं दो मजदूर, कहीं चार मजदूर तो कहीं कार्यस्थल पूरी तरह खाली दिखाई दिए।


ग्रामीणों का आरोप है कि असली मजदूरों को रोजगार देने के बजाय गांव के चहेते और फर्जी नामों के सहारे सरकारी धन निकालने का खेल चल रहा है। मजदूरों का कहना है कि काम मांगने पर उन्हें टाल दिया जाता है, जबकि कागजों में दूसरे लोगों की हाजिरी भरकर भुगतान किया जा रहा है।


“कमीशन सेटिंग” से चल रहा खेल!


सूत्रों की मानें तो मनरेगा में भ्रष्टाचार का यह खेल बिना संरक्षण के संभव नहीं है। आरोप है कि रोजगार सेवक, सचिव, जेई समेत ब्लॉक स्तर के कई जिम्मेदार कर्मचारियों की मिलीभगत से पूरा खेल संचालित हो रहा है। ब्लॉक के विभिन्न टेबलों पर “तय कमीशन” के बाद ही फाइलें आगे बढ़ती हैं।


यही कारण है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हो पा रही। ग्रामीणों का आरोप है कि राजनीतिक संरक्षण के चलते जिम्मेदार अधिकारी पूरे मामले में मूकदर्शक बने हुए हैं।


शहाबगंज बना भ्रष्टाचार का “हॉटस्पॉट”?


सूत्र बताते हैं कि मनरेगा में गड़बड़ी को लेकर जिले के अन्य ब्लॉकों की तुलना में शहाबगंज ब्लॉक लगातार चर्चा में रहा है। कई गांवों में पहले भी फर्जी मस्टर रोल, बिना कार्य भुगतान और मशीनों से काम कराने जैसे आरोप लग चुके हैं।


यदि केरायगांव समेत अन्य गांवों के कार्यों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो बिभीन्न वर्षो मेकरोड़ों रुपये के घोटाले से पर्दा उठ सकता है।


बड़ा सवाल……?


जब 109 मजदूर कार्य कर रहे थे तो मौके पर मजदूर क्यों नहीं दिखे?
क्या अधिकारियों ने कभी स्थलीय निरीक्षण किया?
गरीब मजदूरों का हक आखिर किसकी जेब में जा रहा है?
शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?


अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मामले में जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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